आपीएमसी (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग (Regulation) ऐक्ट (APMC Act))

हाल ही में आप सबको एपीएमसी ‌के बारे में सुनने को मिल रहा होगा। आप सोच रहे होंगे कि आखिर एपीएमसी होता क्या है? हम आपको बताते हैं एपीएमसी आखिर होता क्या है। किसानों को हमेशा ही फसल बेचने में मुश्किलों का सामना करते रहना पड़ा है। किसान जिन्हें हम अन्नदाता कहते हैं उनका शुरुआत से ही शोषण होता रहा है।
आजादी के बाद देश के कृषि विभाग पर जमींदारों और व्यापारियों का बड़ा कब्जा था। इस कब्जे को हटाने के लिए और किसानों के फसल को सही मूल्य पर बेचने के लिए 1965 में एपीएमसी का गठन किया गया। एपीएमसी के तहत सरकार ने हर एक राज्य में‌ एपीएमसी मार्केट का गठन किया। सरकार ने बताया कि इन मंडियों पर मार्केट कमेटी की नजर रहेगी। यानी इन मंडियों में कोई भी आसानी से खरीद फरोख्त नहीं कर पाएगा। अगर किसी व्यापारी को एपीएमसी मंडी से उपज खरीदनी है तो उसे सरकार से लाइसेंस लेना पड़ता था। सरकार ने यह भी कहा की इन मंडियों में किसानों को एक न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाएगा जिससे उन्हें उनके फसलों का अच्छा दाम मिल सके। एपीएमसी मंडी में किसान अपनी फसलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेच सकते थे।

सबसे पहले किसान अपनी फसल निजी व्यापारियों को बेचा करते थे। और आखिर में जब किसानों का फसल बच जाया करता था तब सरकार उसे न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकार खरीद लेती थी। ऐसे बताया जाता है कि ग्रीन रिवॉल्यूशन की शुरुआत एपीएमसी मंडियों के जरिए हुई। हालांकि जैसे-जैसे वक्त बीतता गया इसमें कमियां आती गई। राजनेताओं के संरक्षण में इन समितियों के जरिये मंडियों पर थोक व्यापारियों का एकाधिकार बना रहा और बिचौलियों की चांदी रही। न तो किसानों को उनके उत्पादों का उचित मूल्य मिला और न ही उपभोक्ताओं को कोई लाभ हुआ।

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