किसानों के सवाल जवाब।​

हाल ही में किसानों के आंदोलन में एक नारा सुनने को मिला, जिसमें किसान कह रहे हैं मंडी बचाओ। किसान ऐसा क्यों कह रहे हैं, और आखिर यह किस मंडी की बात कर रहे हैं? यह बात कर रहे हैं एपीएमसी मंडियों की, किसानों का कहना है कि सरकार विधेयक के जरिए एपीएमसी मंडियों को बंद करना चाहती है। अगर एपीएमसी मंडी बंद हो गई तो किसानों को एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिलेगा। हालांकि हम आपको बता दे, सरकार ने अपने विधेयक में एपीएमसी का जिक्र नहीं किया है या फिर उसे हटाने की बात नहीं कही है। तो फिर आखिर किसान ऐसा क्यों कह रहे हैं?

किसान यह बात इसलिए कह रहे हैं क्योंकि सरकार ने अपने विधेयक में यह बताया है कि मंडी से बाहर व्यापार करने पर व्यापारियों को टैक्स नहीं देना होगा। अगर मंडी से बाहर व्यापार करने पर व्यापारियों को टैक्स नहीं देना होगा तब ज्यादातर व्यापारी मंडी के बाहर ही व्यापार करेंगे। और इसके चलते मंडी खाली हो जाएगी और किसानों के फसल को खरीदने के लिए कोई नहीं बचेगा। आखिर में किसानों को भी मंडी से बाहर ही व्यापार करना पड़ेगा और मंडी से बाहर व्यापार करने पर किसानों को एमएसपी नहीं मिलेगी। कई विशेषज्ञों का यह कहना है कि सरकार झूठ बोल रही है कि इस विधेयक से किसानों को फसल कहीं और बेचने की आज़ादी मिलेगी। किसानों के पास ऐसी आजादी पहले से ही थी। किसान पहले भी अपनी उपज को मंडी से बाहर बेच सकते थे। बताया जाता है कि लगभग 86% किसान अपना आनाज एक जिले से दूसरे जिले में नहीं बेच सकते हैं तो क्या वह पंजाब से बेंगलुरु बेच सकेंगे?

किसानों का यह भी कहना है कि ये विधेयक कृषि का निगमी करण कर देंगे। इसके कारण बड़ी-बड़ी कंपनियां भारत के कृषि क्षेत्र में सीधा प्रवेश कर जाएंगे और कृषि क्षेत्र पर अपना एकाधिकार जमा लेंगे। देश में ज्यादातर किसान पढ़े-लिखे नहीं है। जिसके कारण किसान बड़े-बड़े कॉन्ट्रैक्ट को नहीं समझ पाएंगे जो बड़ी-बड़ी ‌कॉर्पोरेट कंपनियां उनके साथ बनाएंगे। किसानों का यह भी कहना है कि एपीएमसी मंडियों में एक न्यूनतम मूल्य बताया जाता था। और उस पर उनके उपज को खरीदा और बेचा जाता था। अब अगर नए नियमों को देखें तो किसानों को सीधे बड़े कॉरपोरेट्स से व्यापार करना होगा और उनसे उपज की राशि तय करना किसानों के लिए काफी ज्यादा मुश्किल होगा। वहां पर अगर बड़े कॉरपोरेट्स किसानों से यह कहने लगे कि “हम तुम्हें इतनी ही पैसे देंगे, तुम्हारा फसल इतने में ही खरीदेंगे, तुम्हें यही करना पड़ेगा”, तब किसान क्या करेगा? आखिर मे कुछ नहीं तो एपीएमसी मंडियों में एक नियम तो था जिसके तहत किसान अपनी फसल का न्यूनतम मूल्य हासिल कर सकते थे। या फिर व्यापारियों से व्यापार कर सकते थे। यहां पर किसानों का यह कहना है कि सरकार पूरे देश में एक‌ न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) लागू कर दे। ताकि किसान अपनी फसल को मंडी में या फिर मंडी से बाहर उसी एक न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेच सके।

वही अगर हम बात कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की करें तो। अगर किसान के साथ कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में कुछ गलत हो जाता है तो आखिर वह मजबूर किसान इंसाफ के लिए कहां-कहां भटकेगा। विवाद समाधान मे भी कोर्ट से ज्यादा पावर नौकरशाहों को दिया गया है।‌ इस स्थिति में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग भी तभी सफल है जब किसान और कॉरपोरेट सामान्य हो।

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